चिट्ठी के नाम खुला ख़त

डिअर चिट्ठी,

कहाँ हो आजकल, बहुत दिन हुए तुम आयी नहीं | व्यस्त हो ? बचपन में जब तुमसे पहली बार मिलना हुआ था तब पांच साल का था | तुम कही दूर से आई मेज़ पर पड़ी आराम फ़रमा रही थी कि तभी दादा जी बोले “खोल और पढ़ इसे” |

जब तक शब्दों की ईंटें जोड़ जोड़कर मानी की इमारत खड़ी कर पाता, तुम्हारी बातें समझ पाता, तब तक दादाजी के हाथ मेरे चेहरे के दोनों तरफ उगी खटाई नुमा नॉब्स तक पहुच गए थे और ‘ट्यूनिंग’ का काम शुरू हो चूका था|कान्वेंट की पढाई से हिंदी और अन्य ‘अपनी’ भाषाओं को होने वाली हानि पर एक लम्बा चौड़ा निबंध मेरे ज़ेह्न पर लिखा जा रहा था | बहुत गुस्सा आया था उस दिन तुम पर| जी में आया की फाड़ कर टुकड़े टुकड़े कर दूं तुम्हारे, फिर तुम्हारा दाह संस्कार करके अवशेष गंदे नाले में प्रवाहित कर दूँ|

मगर कुछ तो था तुम्हारे और मेरे बीच जिसने मुझे रोक लिया था और फिर धीरे धीरे तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त बन गयी | जब भी तुम आती छुप-छुप कर तुम्हे पढ़ता था और सही मायने में हिंदी को पढने लिखने और सीखने का सच्चा ज्ञान तुमने ही दिया |

एक तुम ही थी जिसके आने से पता चल जाता था कि कौन से नंबर के मामा की शादी होने वाली है, और बुआ की शादी में, होने वाले फूफा के घर वालों ने क्या क्या फ़रमाइश रखी है, कौन हमारी ज़मीन को हथियाने के लिए कैसे कैसे षड़यंत्र रच रहा है, कौन से रिश्तेदार की शादी किसके कारण टूटी आदि आदि| यानी भाषा ही नही दुनियादारी के पेंचोखम भी तुमने ही मुझे सिखाये|

एक दिन मैंने भी शौक शौक में २५ पैसे का एक पोस्ट कार्ड खरीदा, कुछ लिखा और भेज दिया था तुम्हें किसी अंजान पते पर | कुछ कुछ याद तो है कि क्या लिखा था मगर अब ख़ुद को समझदार दिखाने की ऐसी आदत लग गयी है कि वो बातें होंठों पर नहीं आतीं | सो जाने देते हैं, “कुछ बातें अनकही ही सही” ये भी तो तुमसे ही सीखा है|

खैर, क्या पता किसे मिली, किसने पढ़ा, पढ़ा भी या नहीं या फिर भारतीय डाक विभाग ने छटनी में ही कटनी कर दी थी | पर सच्ची चिट्ठी लिखने और भेजने का मज़ा बताया नहीां जा सकता|
तुमसे कुछ ज़ियादा ही जुड़ गया था और हमारा मिलना जुलना जारी था| फिर धीरे धीरे हम भी उम्र में बढ़ते जा रहे थे |

एक लड़की थी जो कोचिंग में हमारे साथ ही पढ़ती थी| लेडीबर्ड से जब आती तो उसे देख कर ना जाने क्यू सब कुछ अच्छा सा लगने लगता था | लगता था की उससे कोई जन्म जन्मांतर का रिश्ता सा है | दोस्तों ने एकमत स्वर से घोषित किया की प्यार है “सच्चा वाला”|”पक्के वाले” दोस्तों ने तो इस दैवीय सत्य के उदघाटन के एवज में न जाने कितने समोसे डकारे | एक अभिन्न मित्र ने सलाह दी कि तुम्हारी, यानी ख़त की मदद ली जाए (जवानी का अंदेशा होते ही लड़के उर्दू ख़ुद ब ख़ुद सीख जाते हैं, और बालपन की चिट्ठी को यौवन के ख़त से रिप्लेस कर देते हैं) और अपने मन की बात उस लड़की तक पहुँचा दी जाए| तुमसे सब कुछ कह भी दिया लेकिन तुम कहीं किसी गलत हाथ में पड़ कर सारे भेद खोल न दो इस डर से तुम्हारी हत्या करनी पड़ी| तुम्हारे छत-विछ्त अंगों को नाली में बहा दिया था| क्या करता? सच जो पता चला था कि उस लड़की के पिता जी हमारे गणित के अध्यापक और क्लास टीचर भी थैे|शायद इसके सिवा कोई चारा न था उस वक़्त मगर फिर भी इस बात का गिल्ट रहा हमेशा… काश उस वक़्त मैं तुम पर भरोसा कर पाता… काश तुम अपने गंतव्य तक जा पाती…

अभी कल ही मिली थी वो बाजार में, अपने दो प्यारे से बच्चों के साथ| जब मुझे पहचानते हुए उसने बच्चों को “मामा को हैलो” बोलने को कहा था|

धीरे धीरे समय बीत रहा था और कुछ न कह पाने का दर्द भी जाने लगा था | तुम्हारा भी आना जाना कम हो गया था |हाई स्कूल के एग्जाम आने वाले थे और घर में अब तक फ़ोन का आगमन हो चुका था |
अब तुम बस नाम मात्र के लिए मिलती थी | रिश्तेदारों का हालचाल भी फ़ोन पर मिल जाता था |डाकिया बाबू भी अब ईद का चाँद हो गए थे और उनकी आवाई सिर्फ सरकारी कागजों और बख्शीश तक ही रह गयी थी | अभी कल को ही आये थे आधार कार्ड लेकर पर तुम्हारा पता नहीं बताया |

कुछ लोग कहते है तुम बदल गयी हो , मॉडर्न हो गयी हो इन्टरनेट वाली हो गयी हो और सिर्फ ईमेल और त्वरित संदेशों में आती हो | पर सच बोलू तो मुझे तुम्हारा ये रूप रंग नहीं पसंद | अभाव है इसमें अपनेपन का, आत्मीयता का | वही रटी रटायी बातें डिअर सर /मैडम से शुरू होकर रेगार्ड्स “फलनवा कुमार ढिमकवा” पर ख़त्म हो जाती है | कुछ लोग तो ऐसे ही चिट्ठी लिखते रहते है | बोलते है मैंने कोई लॉटरी जीती है | कल तो किसी ने बताया हमारी कोई कंपनी है तेल की ओमान में, पर सब गलत बोलते है | मुझे पता है मेरी चिट्ठी इतनी गलत नही हो सकती | लोगो ने ही तुम्हें बरगलाया है |अभी कुछ दिनो पहले ही गर्लफ्रेंड बनी है मेरी | सुंदर है दिल से भी और दिमाग से भी पर वो भी नहीं लिखती चिट्ठियां मुझको , व्हाट्सएप्प करती है| बातें करती है , सुबह से शाम तक फ़ोन झनझनाता है |

गुड मोर्निंग से शुरू होकर गुड नाईट तक सैकड़ों सवाल | खाना खाए, पानी पिए , क्या कर रहे हो , गुस्सा हो इत्यादि इत्यादि | अब उसे कौन बताये की खाना पानी नहीं लेंगे तो मर जायेगे और पीएचडी कर रहे है तो रिसर्च करेगे| गुस्सा आता है उसकी इन सभी अजीब बातों से | पर बोलते नहीं , गर्लफ्रेंड है ना, नाराज हो गयी तो ! और फिर वो भी ना, चली जायेगी छोड़कर, जैसे तुम छोड़ कर चली गयी थी |

चलो बहुत सी है बातें करने को, कभी फुर्सत मिले तो आना | साथ में बैठेगे तुम और मैं, चाय की प्याली के साथ| फिर तुम कहना मुझसे कुछ दूर देश की बातें जो किसी अपने ने लिखी होगी प्यार में, अपनेपन की रोशनाई से |
अलविदा
तुम्हारा अपना
अथर्व

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